दुर्गा चालीसा

05 Jul 2026


दुर्गा चालीसा\r\n \r\nनमो नमो दुर्गे सुख करनी।\r\nनमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥\r\n \r\nनिरंकार है ज्योति तुम्हारी।\r\nrecommended by\r\n\r\n\r\n\r\nBajaj Broking\r\nOpen Your Demat Account Online With Bajaj Broking And Start Investing\r\nStart investing with a seamless digital account opening process.\r\nContinue\r\nतिहूं लोक फैली उजियारी॥\r\n \r\nशशि ललाट मुख महाविशाला।\r\nनेत्र लाल भृकुटि विकराला॥\r\n \r\nरूप मातु को अधिक सुहावे।\r\nदरश करत जन अति सुख पावे॥\r\n \r\nतुम संसार शक्ति लै कीना।\r\nपालन हेतु अन्न धन दीना॥\r\n \r\nअन्नपूर्णा हुई जग पाला।\r\nतुम ही आदि सुन्दरी बाला॥\r\n \r\nप्रलयकाल सब नाशन हारी।\r\nतुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥\r\n \r\nशिव योगी तुम्हरे गुण गावें।\r\nब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥\r\n \r\nरूप सरस्वती को तुम धारा।\r\nदे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥\r\n \r\nधरयो रूप नरसिंह को अम्बा।\r\nपरगट भई फाड़कर खम्बा॥\r\n \r\nरक्षा करि प्रह्लाद बचायो।\r\nहिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥\r\n \r\nलक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।\r\nश्री नारायण अंग समाहीं॥\r\n \r\nक्षीरसिन्धु में करत विलासा।\r\nदयासिन्धु दीजै मन आसा॥\r\n \r\nहिंगलाज में तुम्हीं भवानी।\r\nमहिमा अमित न जात बखानी॥\r\n \r\nमातंगी अरु धूमावति माता।\r\nभुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥\r\n \r\nश्री भैरव तारा जग तारिणी।\r\nछिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥\r\n \r\nकेहरि वाहन सोह भवानी।\r\nलांगुर वीर चलत अगवानी॥\r\n \r\nकर में खप्पर खड्ग विराजै।\r\nजाको देख काल डर भाजै॥\r\n \r\nसोहै अस्त्र और त्रिशूला।\r\nजाते उठत शत्रु हिय शूला॥\r\n \r\nनगरकोट में तुम्हीं विराजत।\r\nतिहुंलोक में डंका बाजत॥\r\n \r\nशुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।\r\nरक्तबीज शंखन संहारे॥\r\n \r\nमहिषासुर नृप अति अभिमानी।\r\n\r\nजेहि अघ भार मही अकुलानी॥\r\n \r\nरूप कराल कालिका धारा।\r\nसेन सहित तुम तिहि संहारा॥\r\n \r\nपरी गाढ़ संतन पर जब जब।\r\nभई सहाय मातु तुम तब तब॥\r\n \r\nअमरपुरी अरु बासव लोका।\r\nतब महिमा सब रहें अशोका॥\r\n \r\nज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।\r\nतुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥\r\n \r\nप्रेम भक्ति से जो यश गावें।\r\nदुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥\r\n \r\nध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।\r\nजन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥\r\n \r\nजोगी सुर मुनि कहत पुकारी।\r\nयोग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥\r\n \r\nशंकर आचारज तप कीनो।\r\nकाम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥\r\n \r\nनिशिदिन ध्यान धरो शंकर को।\r\nकाहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥\r\n \r\nशक्ति रूप का मरम न पायो।\r\nशक्ति गई तब मन पछितायो॥\r\n \r\nशरणागत हुई कीर्ति बखानी।\r\nजय जय जय जगदम्ब भवानी॥\r\n \r\nभई प्रसन्न आदि जगदम्बा।\r\nदई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥\r\n \r\nमोको मातु कष्ट अति घेरो।\r\nतुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥\r\n \r\nआशा तृष्णा निपट सतावें।\r\nरिपू मुरख मौही डरपावे॥\r\n \r\nशत्रु नाश कीजै महारानी।\r\nसुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥\r\n \r\nकरो कृपा हे मातु दयाला।\r\nऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।\r\n \r\nजब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।\r\nतुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥\r\n \r\nदुर्गा चालीसा जो कोई गावै।\r\nसब सुख भोग परमपद पावै॥\r\n \r\nदेवीदास शरण निज जानी।\r\nकरहु कृपा जगदम्ब भवानी॥\r\n \r\n॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥